सरगुजा का संक्षिप्त इतिहास: रामगढ़ की गुफाओं से राजसी रियासत तक
अंबिकापुर के आसपास सरगुजा के दो हज़ार साल: रामगढ़ की ब्राह्मी लिपि वाली गुफाएँ, सतमहला के मंदिरों के अवशेष, रक्सेल राजवंश और उनकी रियासत, और वह देवी जिनके नाम पर शहर का नाम है।
सरगुजा को अक्सर जंगलों और पहाड़ों का इलाका कहा जाता है, और यह सच भी है। पर अंबिकापुर के आसपास की धरती मध्य भारत के कुछ सबसे पुराने लिखे शब्द, मध्यकालीन मंदिरों के अवशेष, और एक ऐसी रियासत की कहानी भी समेटे है जो आज़ादी तक चली। यहाँ वह इतिहास संक्षेप में है, उन जगहों के साथ जहाँ आप उसे आज भी देख सकते हैं।
चट्टानों पर लिखे शब्द: रामगढ़ की गुफाएँ
अंबिकापुर से लगभग 45–50 किमी दूर रामगढ़ की पहाड़ियों में चट्टान काटकर बनाई गई दो छोटी गुफाएँ हैं: सीताबेंगरा और जोगीमारा। विद्वान इन्हें लगभग ईसा पूर्व तीसरी से पहली शताब्दी का मानते हैं, यानी ये इस इलाके में इंसानों की बनाई सबसे पुरानी जगहों में से हैं।
जोगीमारा में ब्राह्मी लिपि और मागधी प्राकृत भाषा में एक छोटा अभिलेख है। इसमें सुतनुका नाम की एक स्त्री का नाम है, जिसे देवदासी कहा गया है, और देवदिन्न नाम के एक पुरुष का। देवदासी शब्द का यह सबसे पुराना ज्ञात प्रयोग है, हालाँकि यहाँ यह शायद बाद के मंदिर से जुड़े अर्थ में नहीं, बल्कि एक उपाधि या नाम की तरह आया है। पंक्तियों के अर्थ पर विद्वान एकमत नहीं: कुछ इसे प्रेम-संदेश पढ़ते हैं, तो कुछ किसी विश्राम-गृह का समर्पण। छत पर बहुत पुराने चित्रों के निशान आज भी बचे हैं।
सीताबेंगरा में ऊँचे चबूतरे के सामने चट्टान की सीढ़ीनुमा बैठकें बनी हैं। इसी बनावट के कारण इसे अक्सर भारत की सबसे पुरानी नाट्यशालाओं में से एक कहा जाता है, हालाँकि कुछ विद्वान मानते हैं कि यह यात्रियों के ठहरने की जगह थी।
स्थानीय परंपरा रामगिरि कहलाने वाली इस पहाड़ी को श्रीराम के वनवास से जोड़ती है, और महाकवि कालिदास से भी, जिनका मेघदूत रामगिरि नाम की जगह से शुरू होता है। कई विद्वान कालिदास के रामगिरि को नागपुर के पास रामटेक मानते हैं। जो भी हो, यह कहानी सरगुजा की अपने अतीत की पहचान का हिस्सा है।
जंगल में मंदिर: सतमहला
अंबिकापुर से लगभग 40 किमी दूर कलचा गाँव के भदवाही में सतमहला यानी “सात महल” के अवशेष हैं। असल में ये पुराने मानव-निर्मित तालाबों के किनारे ईंट और पत्थर के मंदिरों का समूह हैं। इन्हें आम तौर पर लगभग 8वीं से 11वीं शताब्दी के बीच का माना जाता है, जब मध्य भारत के इस हिस्से पर सोमवंशी और कलचुरी जैसे राजवंशों का प्रभाव था। खुदाई में नक्काशीदार द्वार और मूर्तियाँ मिली हैं। ऐसे कई और स्थल सरगुजा के जंगलों में बिखरे हैं, जो बताते हैं कि यह “दूर-दराज़” इलाका कभी ख़ूब आवाजाही वाला था।
रक्सेल राजवंश और सरगुजा रियासत
कई सदियों तक सरगुजा पर रक्सेल राजवंश का राज रहा, जो एक राजपूत परिवार था और माना जाता है कि आज के झारखंड के पलामू से आया था। उनकी राजधानी अंबिकापुर थी। अंग्रेज़ों के समय सरगुजा अपने महाराजाओं के शासन वाली एक रियासत थी, और 1 जनवरी 1948 को भारतीय संघ में शामिल होने तक ऐसी ही रही।
आज़ादी के बाद यह इलाका मध्य प्रदेश का हिस्सा बना, और 2000 से छत्तीसगढ़ का हिस्सा है। पुराने ज़िले से बाद में नए ज़िले बने: 1998 में कोरिया, और 2012 में बलरामपुर-रामानुजगंज और सूरजपुर। अंबिकापुर आज भी सरगुजा ज़िले का मुख्यालय और उत्तरी छत्तीसगढ़ का प्रमुख शहर है।
देवी और शहर
अंबिकापुर का नाम देवी अंबिका के नाम पर है, जिन्हें यहाँ माँ महामाया के रूप में पूजा जाता है। शहर की पूर्वी पहाड़ियों पर उनका मंदिर महाराजा रघुनाथ शरण सिंहदेव ने बनवाया, जिन्होंने 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में सरगुजा पर राज किया। स्थानीय मान्यता है कि देवी का धड़ यहाँ विराजमान है और शीश रतनपुर के महामाया मंदिर में, इसीलिए कई श्रद्धालु दोनों मंदिरों के दर्शन करते हैं।
रघुनाथ पैलेस
शहर में रघुनाथ पैलेस है, जिसे सरगुजा पैलेस भी कहते हैं: पूर्व राजपरिवार का लंबा, सफ़ेद, दो-मंज़िला महल। इसे आम तौर पर बाहर से ही देखा जा सकता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार दशहरे के दिन महल आम लोगों के लिए खुलता है और राजपरिवार के सदस्य लोगों से मिलते हैं; इसके भरोसे योजना बनाने से पहले स्थानीय रूप से पूछ लें।
जीवंत संस्कृति
सरगुजा का इतिहास सिर्फ़ पत्थरों में नहीं है। ज़िले के आधे से ज़्यादा लोग आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) समुदायों से हैं, जिनमें गोंड, उरांव, कंवर, कोरवा, नगेसिया और रजवार शामिल हैं। पहाड़ी कोरवा को देश के विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों में गिना जाता है। उनके त्योहार और नृत्य पूरे साल की लय तय करते हैं: करमा पर्व के आसपास करमा नृत्य, और फ़सल के बाद पुरुषों का शैला नृत्य। इन्हें देखने का सबसे अच्छा मौका मैनपाट महोत्सव जैसे स्थानीय उत्सव हैं।
ख़ुद देखिए
ये सभी जगहें अंबिकापुर से घूमी जा सकती हैं। हमारी तीन दिन की सरगुजा यात्रा गाइड इन्हें एक आसान प्लान में जोड़ती है, और मौसम के हिसाब से गाइड बताती है कि कौन-सी जगह कब सबसे अच्छी लगती है।
प्राचीन स्थलों की तिथियाँ और पाठ प्रकाशित पुरातात्विक अध्ययनों पर आधारित हैं और नए शोध के साथ बदल सकते हैं। किंवदंतियों को किंवदंती के रूप में ही दिया गया है।









